क्या प्रयत्न से उत्कट अभिलाषा (भगवत्प्राप्ति के लिए) जागृत हो सकती है ?
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概要
*अंदर की बेचैनी के कारण भगवान की तरफ चलना मजबूरी है
* ' हे मेरे नाथ मैं आपको भूलू नहीं '
* ' हे नाथ अपना प्रेम दो '
* मनुष्य जीवन कल्पवृक्ष की तरह है
* उत्कट अभिलाषा शराब पीने से खत्म हो जाती है
* Mobile से सुविधा, परन्तु इस से बेचैनी भी बढ़ी
* कलयुग की विशेषता, थोड़ा भी चलोगे, भगवान जल्दी मिलेंगे
* अपने आध्यात्मिक अनुभवों को किसी से share मत करो
* कर्तव्य से जो समय बचे , इस ही में लगाओ
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